रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकारों को बनाया निशाना, 4 घंटे कैद कर किया गया उत्पीड़न

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के भास्कर पारा कोयला खदान क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता को भी चुनौती दी है। रविवार 19 अप्रैल को तीन पत्रकारों के साथ मारपीट, बंधक बनाने और सबूत मिटाने जैसी गंभीर घटनाएं सामने आईंछत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले के भास्कर पारा कोयला खदान क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता को भी चुनौती दी है। रविवार 19 अप्रैल को तीन पत्रकारों के साथ मारपीट, बंधक बनाने और सबूत मिटाने जैसी गंभीर घटनाएं सामने आईं।

मिली जानकारी के अनुसार, चंद्र प्रकाश साहू (संपादक, लोक विचार न्यूज़), लोकेश गोस्वामी (संपादक, सीजी पब्लिक न्यूज़) और मनीष जायसवाल (प्रदेश रिपोर्टर, सीजी वाल न्यूज़) को खदान से जुड़ी अनियमितताओं और स्थानीय विरोध की सूचना मिली थी। इसी आधार पर तीनों पत्रकार मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा ले रहे थे।

पत्रकार अपनी कार से खदान के मुख्य गेट तक पहुंचे, लेकिन वहां मौजूद सुरक्षा गार्ड ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद उन्होंने आसपास के ग्रामीणों से बातचीत की और अमृत सरोवर योजना के तहत बने तालाब और स्नान गृह का निरीक्षण किया।

आगे बढ़ने पर पत्रकार खदान के पीछे के हिस्से तक पहुंचे, जहां ब्लास्टिंग का समय सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक दर्शाया गया था। इसके बावजूद क्षेत्र में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं थे। न तो उचित फेंसिंग थी और न ही पर्याप्त चेतावनी बोर्ड। ग्रामीणों का आना-जाना भी जारी था, जो सुरक्षा मानकों की अनदेखी को दर्शाता है।

पत्रकार मुख्य सड़क से करीब 200 मीटर दूर खड़े होकर वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। वे पूरी तरह सार्वजनिक स्थान से रिपोर्टिंग कर रहे थे। इसी दौरान वहां मौजूद गार्ड और बाद में पहुंचे सुपरवाइजर ने उनके साथ बदसलूकी शुरू कर दी और रिपोर्टिंग से रोकने लगे।

स्थिति तब बिगड़ गई जब शाम करीब 4 बजे एक सफेद बोलेरो वाहन में 5-6 लोग मौके पर पहुंचे और बिना किसी चेतावनी के पत्रकारों पर हमला कर दिया। हमलावरों ने कैमरा और माइक छीनकर फेंक दिए, मोबाइल फोन जब्त कर लिए और पत्रकारों के साथ जमकर मारपीट की। उन्हें जमीन पर गिराकर लात-घूंसों से पीटा गया। चंद्र प्रकाश साहू को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

हमले के बाद तीनों पत्रकारों को जबरन वाहन में बैठाकर खदान परिसर में ले जाया गया, जहां उन्हें बंधक बनाकर रखा गया। वहां उनके पहचान पत्र छीन लिए गए, फोटो खींची गई और जमीन पर बैठाकर पूछताछ की गई। इस दौरान उन पर दबाव बनाया गया कि वे वीडियो में यह स्वीकार करें कि वे अवैध रूप से खदान में घुसे थे, जबकि उनका कहना है कि वे सड़क से ही रिपोर्टिंग कर रहे थे।

पूछताछ के दौरान पत्रकारों के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और उन्हें धमकाया गया। करीब एक दर्जन सुरक्षा कर्मियों ने मिलकर उनके साथ मारपीट की। उन्हें 3 से 4 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया और किसी से संपर्क नहीं करने दिया गया।

शाम करीब 7 बजे उन्हें छोड़ा गया, लेकिन उससे पहले उनके मोबाइल फोन से सभी वीडियो फुटेज डिलीट कर दिए गए और उनकी कार भी पूरे समय कब्जे में रखी गई।

इस दौरान मनीष जायसवाल की तबीयत बिगड़ गई और उनका शुगर लेवल गिर गया। हालांकि बाद में उन्हें चाय दी गई, लेकिन इससे घटना की गंभीरता कम नहीं होती।

इस पूरी घटना ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या पत्रकार अब जमीनी सच्चाई नहीं दिखा सकते? क्या उद्योग क्षेत्रों में रिपोर्टिंग पर अनौपचारिक रोक लगाई जा रही है? और क्या सच उजागर करने वालों को इसी तरह दबाया जाएगा?

इस मामले में हमर उत्थान सेवा समिति ने थाना झिलमिली में शिकायत दर्ज कराई है और निष्पक्ष जांच, आरोपियों की गिरफ्तारी तथा पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

सूरजपुर की यह घटना केवल एक हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।संपादक, सीजी पब्लिक न्यूज़) और मनीष जायसवाल (प्रदेश रिपोर्टर, सीजी वाल न्यूज़) को खदान से जुड़ी अनियमितताओं और स्थानीय विरोध की सूचना मिली थी। इसी आधार पर तीनों पत्रकार मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा ले रहे थे।

पत्रकार अपनी कार से खदान के मुख्य गेट तक पहुंचे, लेकिन वहां मौजूद सुरक्षा गार्ड ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद उन्होंने आसपास के ग्रामीणों से बातचीत की और अमृत सरोवर योजना के तहत बने तालाब और स्नान गृह का निरीक्षण किया।

आगे बढ़ने पर पत्रकार खदान के पीछे के हिस्से तक पहुंचे, जहां ब्लास्टिंग का समय सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक दर्शाया गया था। इसके बावजूद क्षेत्र में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं थे। न तो उचित फेंसिंग थी और न ही पर्याप्त चेतावनी बोर्ड। ग्रामीणों का आना-जाना भी जारी था, जो सुरक्षा मानकों की अनदेखी को दर्शाता है।

पत्रकार मुख्य सड़क से करीब 200 मीटर दूर खड़े होकर वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। वे पूरी तरह सार्वजनिक स्थान से रिपोर्टिंग कर रहे थे। इसी दौरान वहां मौजूद गार्ड और बाद में पहुंचे सुपरवाइजर ने उनके साथ बदसलूकी शुरू कर दी और रिपोर्टिंग से रोकने लगे।

स्थिति तब बिगड़ गई जब शाम करीब 4 बजे एक सफेद बोलेरो वाहन में 5-6 लोग मौके पर पहुंचे और बिना किसी चेतावनी के पत्रकारों पर हमला कर दिया। हमलावरों ने कैमरा और माइक छीनकर फेंक दिए, मोबाइल फोन जब्त कर लिए और पत्रकारों के साथ जमकर मारपीट की। उन्हें जमीन पर गिराकर लात-घूंसों से पीटा गया। चंद्र प्रकाश साहू को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

हमले के बाद तीनों पत्रकारों को जबरन वाहन में बैठाकर खदान परिसर में ले जाया गया, जहां उन्हें बंधक बनाकर रखा गया। वहां उनके पहचान पत्र छीन लिए गए, फोटो खींची गई और जमीन पर बैठाकर पूछताछ की गई। इस दौरान उन पर दबाव बनाया गया कि वे वीडियो में यह स्वीकार करें कि वे अवैध रूप से खदान में घुसे थे, जबकि उनका कहना है कि वे सड़क से ही रिपोर्टिंग कर रहे थे।

पूछताछ के दौरान पत्रकारों के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और उन्हें धमकाया गया। करीब एक दर्जन सुरक्षा कर्मियों ने मिलकर उनके साथ मारपीट की। उन्हें 3 से 4 घंटे तक बंधक बनाकर रखा गया और किसी से संपर्क नहीं करने दिया गया।

शाम करीब 7 बजे उन्हें छोड़ा गया, लेकिन उससे पहले उनके मोबाइल फोन से सभी वीडियो फुटेज डिलीट कर दिए गए और उनकी कार भी पूरे समय कब्जे में रखी गई।

इस दौरान मनीष जायसवाल की तबीयत बिगड़ गई और उनका शुगर लेवल गिर गया। हालांकि बाद में उन्हें चाय दी गई, लेकिन इससे घटना की गंभीरता कम नहीं होती।

इस पूरी घटना ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या पत्रकार अब जमीनी सच्चाई नहीं दिखा सकते? क्या उद्योग क्षेत्रों में रिपोर्टिंग पर अनौपचारिक रोक लगाई जा रही है? और क्या सच उजागर करने वालों को इसी तरह दबाया जाएगा?

इस मामले में हमर उत्थान सेवा समिति ने थाना झिलमिली में शिकायत दर्ज कराई है और निष्पक्ष जांच, आरोपियों की गिरफ्तारी तथा पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।

सूरजपुर की यह घटना केवल एक हमला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा प्रहार है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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