Anp News आस्था, विश्वास और अखंड सौभाग्य का प्रतीक बना वट सावित्री व्रत, 16 मई को विशेष पूजा

Anp News Live वट सावित्री व्रत 2026 : अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है पावन व्रत

16 मई को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा वट सावित्री व्रत, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, कथा और महत्व

भारत की सनातन परंपरा में वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। यह पर्व माता सावित्री और सत्यवान की अमर कथा पर आधारित है, जिसने पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और निष्ठा का संदेश दिया।

इस दिन महिलाएं वट अर्थात बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार बरगद का वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

16 मई 2026 को रखा जाएगा व्रत

कई क्षेत्रों में स्थानीय पंचांग और परंपरा के अनुसार इस वर्ष वट सावित्री व्रत 16 मई 2026, शनिवार को मनाया जाएगा। महिलाएं सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेंगी तथा वट वृक्ष की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करेंगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त

प्रातः श्रेष्ठ मुहूर्त : सुबह 5:45 बजे से 8:15 बजे तक

विशेष पूजा समय : सुबह 7:12 बजे से 8:24 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक

राहुकाल के दौरान पूजा करने से बचने की सलाह दी गई है। राहुकाल सुबह लगभग 8:54 बजे से 10:36 बजे तक रहेगा।

 

सावित्री-सत्यवान की अमर प्रेम कथा से जुड़ा वट सावित्री व्रत, जानिए क्यों है खास

 

यह व्रत पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि, परिवार की रक्षा तथा वैवाहिक जीवन में प्रेम और स्थिरता के लिए किया जाता है। मान्यता है कि माता सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और अटूट पतिव्रता धर्म से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

सावित्री और सत्यवान की अमर कथा

पौराणिक कथा के अनुसार राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और पतिव्रता थीं। उन्होंने सत्यवान को अपना पति चुना। ऋषियों ने पहले ही बता दिया था कि सत्यवान की आयु अल्प है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं।

निर्धारित दिन सत्यवान वन में लकड़ी काटते समय बेहोश होकर गिर पड़े और उनके प्राण निकल गए। यमराज उनके प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ीं। उनकी भक्ति और बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने अपने ससुर की आंखों की रोशनी, राज्य की प्राप्ति और अंत में सौ पुत्रों का वरदान मांगा। यमराज “तथास्तु” कह चुके थे, इसलिए उन्हें सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।

बरगद के वृक्ष का धार्मिक महत्व

बरगद का वृक्ष अत्यंत लंबे समय तक जीवित रहता है और इसकी जड़ें निरंतर बढ़ती रहती हैं। इसलिए इसे दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है।

पूजा सामग्री

वट सावित्री व्रत की पूजा में बरगद का पेड़, जल का लोटा, कच्चा सूत, रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, दीपक, धूप, फल, मिठाई, भीगा चना, पंखा, सुहाग सामग्री और लाल चुनरी का विशेष उपयोग किया जाता है।

ऐसे करें पूजा

महिलाएं सुबह स्नान कर नए वस्त्र धारण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित कर रोली, हल्दी और अक्षत चढ़ाए जाते हैं। वृक्ष के चारों ओर कच्चा धागा लपेटते हुए 7, 11 या 21 बार परिक्रमा की जाती है। इस दौरान “ॐ नमः शिवाय” और “सावित्री सत्यवान की जय” का जाप किया जाता है।

व्रत का महत्व

यह व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास से किया गया यह व्रत परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाता है तथा पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाता है।

शुभकामना संदेश

“माता सावित्री सभी सुहागिन महिलाओं को अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और परिवार में खुशहाली प्रदान करें।”

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