हरेली महोत्सव 2026 में दिखी बस्तर की समृद्ध लोक-संस्कृति और कला की झलक

कोंडागांव, 17 अगस्त 2026। बस्तर की माटी, लोककला, साहित्य, परंपरा और कृषि संस्कृति को सहेजने के उद्देश्य से कोंडागांव में रविवार को “हरेली महोत्सव 2026” का भव्य आयोजन किया गया। बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद, कोंडागांव के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य यंत्र, जनजातीय कला और शिल्प ने लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का संदेश दिया।

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कार्यक्रम का आयोजन छत्तीसगढ़-बस्तर की लोकपरंपराओं और कृषि संस्कृति से जुड़े हरेली (अमुस) तिहार के अवसर पर किया गया। परिषद का उद्देश्य स्थानीय कला, साहित्य, भाषाओं-बोलियों और कलाकारों को मंच प्रदान करते हुए सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। स्थानीय कलाकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की सहमति से श्री गोकुल वैद्य को परिषद का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

 

जनप्रतिनिधियों और कला जगत की रही मौजूदगी

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महोत्सव में मुख्य अतिथि कोंडागांव विधायक एवं बस्तर विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष सुश्री लता उसेंडी रहीं। कार्यक्रम में राज्य फिल्म विकास निगम की अध्यक्ष सुश्री मोना सेन तथा हस्तशिल्प विकास बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती शालिनी राजपूत की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।

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विशिष्ट अतिथियों में पद्मश्री पंडी राम मंडावी, पद्मश्री ऊषा वारले, पद्मश्री अजय कुमार मंडावी, राष्ट्रपति पुरस्कृत बेलमेटल शिल्पकार राजेन्द्र बघेल एवं पंचुराम सागर, राष्ट्रपति पुरस्कृत लौह शिल्पकार तीजु राम विश्वकर्मा, फिल्म निर्देशक अविनाश प्रसाद, फिल्म अभिनेता राकेश यादव, नगर पालिका अध्यक्ष नरपती पटेल और उपाध्यक्ष जशकेतु उसेंडी सहित अन्य अतिथि मौजूद रहे।

 

लोकगीत और लोकनृत्य से जीवंत हुआ बस्तर

 

महोत्सव में प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बस्तर की पारंपरिक संस्कृति की मनोहारी तस्वीर प्रस्तुत की। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

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कार्यक्रम में बस्तर के जल, जंगल, जमीन, प्रकृति और सामुदायिक जीवन से जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं की झलक देखने को मिली। कलाकारों की प्रस्तुतियों में बस्तर की लोकजीवन शैली और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति नजर आई।

 

कलाकारों और शिल्पकारों का सम्मान

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महोत्सव के दौरान पारंपरिक कला और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले कलाकारों एवं शिल्पकारों का सम्मान किया गया। काष्ठ शिल्प, बेलमेटल, लौह शिल्प, जनजातीय वाद्य यंत्र, पंडवानी, लोकसंगीत और लोकनृत्य के क्षेत्र में योगदान देने वाले कला साधकों को सम्मानित किया गया।

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आयोजकों ने कहा कि कलाकारों का सम्मान केवल किसी व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस कला, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है, जिसे कलाकार वर्षों की साधना से जीवित रखते हैं।

 

नई पीढ़ी को संस्कृति से जोड़ने का संदेश

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महोत्सव के माध्यम से स्थानीय बोलियों, पारंपरिक कलाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों और मौखिक साहित्य के संरक्षण पर भी जोर दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिकता के दौर में अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहना आवश्यक है। बच्चों और युवाओं को लोककला एवं परंपराओं से जोड़कर ही इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है।

 

हरेली महोत्सव ने कृषि और संस्कृति के गहरे संबंध को भी रेखांकित किया। खेत, किसान, प्रकृति, पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाला हरेली पर्व बस्तर की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

कोंडागांव में आयोजित यह महोत्सव केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बस्तर की कला, साहित्य, लोकजीवन और परंपराओं को सहेजने का सामूहिक संकल्प भी बनकर सामने आया।

 

“हमारी संस्कृति, हमारी पहचान और हमारा अभिमान” के संदेश के साथ हरेली महोत्सव 2026 ने बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सार्थक पहल की।

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