आदिवासी परंपराओं की अनूठी झलक : दीपावली पर आज भी जीवंत है वॉरी नृत्य की परंपरा
अरनोद उपखंड क्षेत्र के खरखड़ा गांव सहित आसपास के कई आदिवासी बहुल गांवों में दीपावली पर्व पर वॉरी नृत्य की प्राचीन परंपरा आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, एकता और परंपरागत जीवनशैली की सशक्त अभिव्यक्ति मानी जाती है।
जानकारी के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के फनाखेड़ी गांव से होती है, जहां फना बावजी का प्रसिद्ध स्थल है। दीपावली से पूर्व वहां से “पाती” (धार्मिक प्रतीक चिन्ह) लाने की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद गोवर्धन पूजा के दिन गांवों में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।
गांव के युवक और श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर उंट वाले बालाजी मंदिर पहुंचते हैं। वहां पूजा-अर्चना के बाद सभी नर्तक कमर में घुंघरू, हाथों में झाड़ू व हाकल (लाठी) तथा माथे पर झाड़ू लगी पगड़ी धारण कर पारंपरिक वॉरी नृत्य की शुरुआत करते हैं।
ढोल और मांदल की थाप पर पूरे गांव में घूम-घूमकर यह नृत्य किया जाता है। श्रद्धा, उल्लास और भक्ति से ओतप्रोत यह दृश्य पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देता है। नृत्य के समापन पर सभी श्रद्धालु पुनः पैदल यात्रा कर फनाखेड़ी बावजी के स्थान पर पहुंचते हैं, जहां विधिवत पूजा-अर्चना के साथ वॉरी का समापन किया जाता है।
वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और आदिवासी समाज अपनी सांस्कृतिक धरोहर को गर्व के साथ संजोए हुए है।
