कोण्डागांव (छत्तीसगढ़), 01 अगस्त 2025: औद्योगिक विकास की दौड़ में अगर पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण हितों की अनदेखी की जाए, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है कोण्डागांव जिला मुख्यालय से सटे कोकोड़ी गांव में, जहां स्थापित किया गया मां दंतेश्वरी मक्का प्रसंस्करण एवं विपणन सहकारी समिति मर्यादित का मक्का प्रसंस्करण प्लांट इन दिनों स्थानीय किसानों के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा है।
हालांकि यह प्लांट अभी पूरी तरह से चालू नहीं हुआ है, लेकिन प्रारंभिक एथेनॉल उत्पादन की टेस्टिंग के दौरान ही इसके दूषित रासायनिक जल ने क्षेत्र की सैकड़ों एकड़ फसलों को बर्बाद कर दिया है। किसान आरोप लगा रहे हैं कि प्लांट से निकलने वाला केमिकल युक्त बदबूदार अपशिष्ट जल सीधे उनके खेतों और जलस्रोतों तक पहुंच रहा है, जिससे धान की फसल मुरझा रही है और जल आधारित जैवविविधता जैसे मछली, मेंढक, केंचुआ और सांप मारे जा रहे हैं।
स्थानीय किसानों की पीड़ा
कोकोड़ी के मनहेर पोयाम, जो मछली पालन करते हैं, बताते हैं कि प्लांट का दूषित पानी उनके तालाब में आने से मछलियों की मौत हो गई है। वहीं किसान चंदर नेताम का कहना है कि उनकी पूरी धान की फसल नष्ट हो गई है, और दोबारा बोआई के बावजूद फसल नहीं टिक पा रही।
रायपाल नेताम, नेहरू पोयाम, कांति नेताम, मानसिंह पोयाम और जुगधर नेताम जैसे कई किसान अपनी पूरी मेहनत चौपट होने की बात कह रहे हैं और इसके लिए पूरी तरह प्लांट से निकले अपशिष्ट जल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
पर्यावरणीय लापरवाही पर उठते सवाल
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस परियोजना को प्रारंभ करने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) जैसी जरूरी प्रक्रिया को सही ढंग से अपनाया गया था? क्या किसानों और ग्रामीणों को इस परियोजना के संभावित दुष्परिणामों से अवगत कराकर उनकी सहमति ली गई थी? और अब जब नुकसान हो चुका है, क्या सरकार प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा और राहत प्रदान करेगी?
क्या कहता है प्रशासन?
अब तक प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है, लेकिन किसान लगातार सरकार और जिला प्रशासन से न्याय और मुआवजे की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि इस मुद्दे की स्वतंत्र जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।
विकास बन सकता है अभिशाप, अगर न हो संतुलन
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि बिना समुचित योजना और निगरानी के यदि औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाया जाए, तो वह ग्रामीण आजीविका और पर्यावरण दोनों के लिए अभिशाप बन सकता है। कोण्डागांव के किसान फिलहाल सरकार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं — मुआवजे, न्याय और पर्यावरण संरक्षण की आस में।
