कोरबा। यह हादसा सिर्फ एक जंगली हाथी के हमले की कहानी नहीं है, बल्कि उस पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर एक बड़ा सवाल है, जो कागज़ों में तो सफलता की तस्वीर पेश करता है, लेकिन ज़मीन पर आते ही बिखर जाता है। कटघोरा वनमंडल क्षेत्र में महिला हिना निर्मलकर की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर वन विभाग, जिला प्रशासन और सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है।
हिना निर्मलकर रोज़मर्रा की नित्य क्रिया के लिए घर से बाहर निकली थीं। यह तथ्य अपने आप में कई सवाल खड़े करता है, क्योंकि कोरबा जिला वर्षों पहले खुले में शौच मुक्त (ODF) घोषित किया जा चुका है। यदि शौचालय वास्तव में उपलब्ध, सुरक्षित और उपयोग योग्य होते, तो क्या किसी महिला को सुबह-सुबह जान जोखिम में डालकर बाहर जाना पड़ता?
यह घटना साफ तौर पर दिखाती है कि सरकारी योजनाएँ फाइलों और रिपोर्टों में भले ही सफल घोषित कर दी गई हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
लगातार मौतें, बढ़ता डर और गुस्सा
इलाके में लोनर हाथी की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। बीते दिनों में लगातार हो रही घटनाओं ने ग्रामीणों के मन में भय बैठा दिया है। लोग अब सूरज निकलने से पहले या ढलने के बाद घर से बाहर निकलने में डर रहे हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वन विभाग को हाथी की गतिविधियों की पूरी जानकारी है, इसके बावजूद न तो समय रहते उसे आबादी से दूर किया गया और न ही पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की गई।
ग्रामीणों में अब गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है। लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही लोनर हाथी को सुरक्षित रूप से जंगल की ओर नहीं भेजा गया और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।
वन्यजीव संघर्ष नहीं, प्रशासनिक असंवेदनशीलता का मामला
अब यह मामला सिर्फ मानव-वन्यजीव संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है। यह घटना प्रशासनिक लापरवाही, संवेदनहीनता और जवाबदेही के अभाव का प्रतीक बन चुकी है।
हर हादसे के बाद मुआवज़े की घोषणा, दो मिनट का मौन और संवेदना संदेश जारी कर देना अब लोगों को स्वीकार नहीं है। ग्रामीणों का सवाल है कि क्या हर मौत के बाद सिर्फ अफसोस जताना ही प्रशासन की जिम्मेदारी है?
सबसे बड़ा सवाल: किस तीसरी मौत का इंतजार?
सबसे बड़ा और सीधा सवाल अब कटघोरा वनमंडल के डीएफओ से है—
आखिर किस तीसरी मौत का इंतजार किया जा रहा है?
कब तय होगी जिम्मेदारी?
कब सिस्टम हर हादसे के बाद जागने के बजाय पहले से सतर्क होगा?
जब तक लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक जंगल से ज़्यादा खतरनाक यही सिस्टम बना रहेगा—जो हर हादसे के बाद सिर्फ संवेदना जताता है, समाधान नहीं देता।
