रायगढ़- जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर तमनार ब्लॉक के ग्राम कर्मागढ़ में स्थित मां मानकेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्र के आरंभ होते ही भक्तिभाव और आस्था का अनोखा संगम देखने को मिलता है। यह परंपरा शरद पूर्णिमा के दूसरे दिन तक चलती है। इन नौ दिनों में यहां हजारों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। विशेष बात यह है कि यहां बलिप्रथा आज भी परंपरा के रूप में जीवित है, जिसे देवी भोग स्वरूप स्वीकार करती हैं।
राजघराने की कुलदेवी मां मानकेश्वरी
कर्मागढ़ के राजघराने की कुलदेवी मां मानकेश्वरी देवी की पूजा हर वर्ष शरद पूर्णिमा के दिन विशेष विधि-विधान से की जाती है। इस अवसर पर राजपरिवार के सदस्य, ग्रामवासी और आसपास के गांवों से आए श्रद्धालु मिलकर सामूहिक पूजा-अर्चना करते हैं। परंपरा के अनुसार, जब मंदिर परिसर में पूजा आरंभ होती है, तो बैगा बीरबल सिदार के शरीर में देवी का प्रभाव (देवी का वास) होता है।बैगा पशुबलि का रक्तपान करता है। इसका दुष्प्रभाव भी माता की कृपा से उसके शरीर पर नहीं पड़ता है।
माता के प्रभाव में होती है बलिपूजा
माता के प्रभाव के बाद भक्तजन भोग के रूप में बकरों की बलि अर्पित करते हैं। इसे देवी को प्रसन्न करने और गांव की सुख-शांति की कामना से जुड़ी प्रथा माना जाता है। यह पूजा और बलि की परंपरा सदियों पुरानी है और आज भी उसी श्रद्धा और भक्ति से निभाई जाती है।
इतिहास से जुड़ा चमत्कारिक प्रसंग
स्थानीय किंवदंती के अनुसार, लगभग 1700 ईस्वी में हिमगिरि (वर्तमान ओडिशा) रियासत का राजा, युद्ध में पराजित होकर जंजीरों में जकड़ा गया था। उसे जंगल में छोड़ दिया गया, जहां वह भटकते हुए कर्मागढ़ पहुंचा। यहीं मां मानकेश्वरी ने उसे दर्शन देकर बंधनों से मुक्त किया। तभी से राजा और उनके वंशज इस स्थान को देवी की कृपा का प्रतीक मानते हैं।
अंग्रेजों से जुड़ा ऐतिहासिक युद्ध
एक अन्य ऐतिहासिक घटना सन 1780 की मानी जाती है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अंग्रेज अधिकारी कठोर लगान वसूलने के लिए रायगढ़ और हिमगिरि क्षेत्र पर हमला करने पहुंचा। युद्ध का मैदान कर्मागढ़ के जंगलों में बना। तभी देवी की कृपा से जंगल से अचानक मधुमक्खियों और जंगली कीटों का झुंड निकलकर अंग्रेज सेना पर टूट पड़ा। इससे अंग्रेज सैनिक भयभीत होकर पराजित हुए और वापस लौट गए। उस घटना के बाद अंग्रेजों ने रायगढ़ स्टेट को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।
आज भी दोहराई जाती है वही परंपरा
हर वर्ष शरद पूर्णिमा की रात निशा पूजन के समय राजपरिवार के सदस्य बैगा को एक विशेष अंगूठी पहनाते हैं। यह अंगूठी सामान्य रूप से ढीली रहती है, लेकिन जैसे ही देवी का प्रभाव बैगा पर होता है, वह अंगूठी स्वयं कसकर उंगली में फिट हो जाती है। इसे मां मानकेश्वरी की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।
श्रद्धा और चमत्कार का केंद्र
कर्मागढ़ का यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आस्था और ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक भी है। यहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु देवी के चमत्कार को देखने, माता का आशीर्वाद लेने और अपने जीवन की उन्नति की कामना से पहुंचते हैं।
