बाँकी मोंगरा के मोंगरा बस्ती में यादव परिवार के द्वारा श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया ।

बाँकी मोंगरा के मोंगरा बस्ती में यादव परिवार के द्वारा श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया गया ।
यह आयोजन 1 सितम्बर से 8 सितंबर तक चलेगी।

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कथा ब्यास आचार्य भोला शंकर पांडेय जी के श्रीमुख से कथा का लाभ लेने पूरे ग्राम वासी पहुँचे। श्रीमद्भागवत कथा का रसपान करने से सद्गति प्राप्त होती है ।कथा श्रवण में आपमे मन को मनमोहन की ओर लगा कर रखना चाहिए।
आचार्य ने बताया कि
शब्द के अक्षरों 'भा', 'ग', 'व', 'त' से भी अर्थ निकाला जाता है, जो क्रमशः भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और परम तत्व (त्याग या तत्व) का प्रतीक हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान कृष्ण की लीलाओं और विष्णु के अवतारों का वर्णन मिलता है, जो भक्ति और ज्ञान के माध्यम से परम तत्व की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।
जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाते हुए अंततः परम तत्व (परमात्मा) की प्राप्ति में सहायक हो, वही भागवत है।
जब सौभाग्य का उदय होता है तभी भागवत कथा सुनने मिलती है। भगवान सत्य स्वरूप हैं। चित्त स्वरूप हैं। आनंद स्वरूप हैं। दैहिक, देविक, भौतिक तापों का हरण करने वाले हैं। उन्होंने कहा कि सूतजी महाराज ने ८८ हजार ऋषियों को नैमीशारण्य में भागवत कथा सुनाई थी। वृंदावन में भक्ति का महत्व है। ज्ञान वैराग्य नहीं है, नारद जी का अवतारों में तीसरा अवतार है।

उन्होंने कहा कि भागवत का अर्थ है भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और तारण। प्रेत योनि से मुक्त करने वाली भागवत कथा है। धुंधकारी और गौकर्ण की कथा बताते हुए आचार्य जी ने कहा कि आत्मदेव ब्राह्मण की कोई संतान नहीं थी। निराश ब्राह्मण को एक संत ने फल दिया, कहा पत्नी को खिलाना लाभ होगा। उसने फल स्वयं न खाकर गाय को दे दिया और पति से झूठ बोल दिया। समय पूर्ण होने पर प ि- धुंधली ने अपनी बहन का पुत्र लिया और स्वयं का बताकर नाम धुंधकारी रखा। उसी समय गाय को भी पुत्र हुआ, जिसका नाम गौकर्ण रखा गया।

धुंधकारी अत्याचारी, अहंकारी था जबकि गौकर्ण विद्वान था। धुंधकारी से परेशान ब्राह्मण वन गमन कर गए। मां धुंधली ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली। धुंधकारी की वेश्याओं ने निर्मम हत्या कर दी। असमय मौत ने उन्हें प्रेत बना दिया। परिजनों की मुक्ति की आकांक्षा से गौकर्ण ने भागवत
सप्ताह यज्ञ कराया। जिससे प्रेत योनि से मुक्ति मिली।

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