धान खरीदी की अव्यवस्था से टूटा किसान, टोकन न मिलने पर कीटनाशक पीया

कोरबा। प्रदेश में 15 नवम्बर से धान खरीदी की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन कई जिलों में खरीदी केंद्रों पर अव्यवस्थाओं का आलम सामने आ रहा है। कहीं रकबा घटाने की शिकायत है तो कहीं समय पर टोकन नहीं कटने से किसान लगातार परेशान हो रहे हैं। इसी अव्यवस्था का गंभीर परिणाम कोरबा जिले में देखने को मिला, जहां धान खरीदी केंद्र में टोकन न कटने से आहत एक किसान ने कीटनाशक दवा पी ली।

घटना के बाद किसान की तबीयत बिगड़ गई, जिसे तत्काल जिला अस्पताल कोरबा में भर्ती कराया गया। फिलहाल किसान का इलाज जारी है और चिकित्सकों की निगरानी में उसकी हालत स्थिर बताई जा रही है।

 

टोकन न मिलने से मानसिक तनाव में किसान

पीड़ित किसान की पहचान सुमेर सिंह गोंड, निवासी ग्राम कोरबी धतूरा के रूप में हुई है। किसान ने बताया कि उसके पास 3 एकड़ 75 डिसमिल कृषि भूमि है और उसने सभी आवश्यक प्रक्रियाओं के तहत पंजीयन भी कराया है। इसके बावजूद नॉनबिर्रा धान खरीदी केंद्र में बीते डेढ़ महीने से उसे टोकन नहीं दिया जा रहा, जिससे वह मानसिक तनाव में आ गया।

किसान का आरोप है कि कभी रकबा को लेकर तो कभी अन्य कारण बताकर उसे लगातार टाल दिया गया, जिससे वह अपने धान की बिक्री नहीं कर पा रहा था।

 

सांसद ने अस्पताल पहुंचकर जाना हालचाल

घटना की जानकारी मिलते ही कोरबा सांसद जिला अस्पताल पहुंचीं और पीड़ित किसान का हालचाल जाना। सांसद ने किसान और उसके परिजनों से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी ली और संबंधित अधिकारियों से भी चर्चा की।

 

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल

इस दौरान सांसद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद आदिवासी किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक है। उन्होंने धान खरीदी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि किसानों को समय पर टोकन और उचित सुविधाएं मिलनी चाहिए, ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

 

किसानों में आक्रोश, सुधार की मांग

इस घटना के बाद क्षेत्र के किसानों में रोष व्याप्त है। किसानों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि धान खरीदी केंद्रों पर व्याप्त अव्यवस्थाओं को तत्काल दूर किया जाए, टोकन प्रणाली को पारदर्शी बनाया जाए और किसानों को मानसिक व आर्थिक रूप से परेशान न किया जाए।

यह घटना न केवल धान खरीदी व्यवस्था की खामियों को उजागर करती है, बल्कि किसानों की मानसिक पीड़ा और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।

Related Post