कोण्डागांव, 25 अगस्त 2025 — जिले के कोकोड़ी गांव में पढ़ाई का सपना देख रहे नन्हे बच्चों और उनके पालकों के लिए सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल की मनमानी परेशानी का सबब बन गई है। गांव के कुछ बच्चों ने भारी उम्मीदों के साथ स्कूल में दाखिला लिया, फीस भी जमा की, लेकिन अब स्कूल प्रबंधन ने गांव में वैन भेजने से इंकार कर बच्चों के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
क्या है पूरा मामला?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सरस्वती शिशु मंदिर द्वारा पहले गांव का दौरा कर बच्चों को स्कूल में एडमिशन के लिए प्रेरित किया गया। अनुमानित 10 बच्चों का दाखिला तय माना जा रहा था, लेकिन अंतिम रूप से सिर्फ तीन बच्चों ने स्कूल में नामांकन कराया। शुरुआत में इन बच्चों को लाने-ले जाने के लिए स्कूल वैन चलाई गई, जो करीब 15 दिन तक चली भी।
लेकिन अचानक स्कूल प्रबंधन ने 'खर्चा ज्यादा होने' का हवाला देते हुए गांव में वैन भेजना बंद कर दिया। इससे बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं और उनकी पढ़ाई पूरी तरह ठप हो गई है। पालकों का आरोप है कि स्कूल वेन फीस सहित बच्चों की पूरी फीस जमा की जा चुकी है, लेकिन न तो शिक्षा मिल रही है और न ही वैन की सुविधा। फीस लौटाने की मांग करने पर भी प्रबंधन ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया है।
राजनीतिक दलों का भी मिला साथ
इस मामले में कांग्रेस पार्टी ने स्कूल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस नेताओं ने इसे बच्चों के भविष्य के साथ 'खिलवाड़' करार दिया है और कहा है कि जब पहले से स्कूल प्रबंधन को गांव से कम बच्चों के आने की आशंका थी, तो वैन सुविधा का वादा क्यों किया गया? इस मामले पर कांग्रेस पार्टी द्वारा सोमवार को जिला कार्यालय पहुंचकर कोंडागांव कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा गया है।
पालकों में रोष, बच्चों में निराशा
कोकोड़ी गांव के पालक बेहद नाराज़ हैं। उनका कहना है कि स्कूल प्रशासन ने बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए पहले भरोसा दिलाया और फिर अब उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। बच्चों में भी मायूसी छाई हुई है क्योंकि वे स्कूल जाकर पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं।
क्या कहता है नियम और प्रशासन?
फ़िलहाल इस पूरे मामले पर अब शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन का बयान आना बाकी हैं। पालकों ने मांग की है कि या तो स्कूल वैन पुनः शुरू की जाए या फिर पूरी फीस लौटाई जाए ताकि वे अपने बच्चों को अन्यत्र दाखिला दिला सकें।
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यह मामला न सिर्फ एक गांव के बच्चों की शिक्षा से जुड़ा है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि निजी स्कूलों की जवाबदेही तय कौन करेगा? जब शिक्षा एक अधिकार है, तो क्या स्कूलों को मनमाने फैसले लेने की छूट दी जा सकती है?
