छत्तीसगढ़ में कार्यरत दस हजार से अधिक ग्राम पंचायत सचिव, जो वर्षों से सरकार की योजनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, आज खुद उपेक्षा का शिकार नजर आ रहे हैं। ये पंचायत सचिव लंबे समय से शासकीयकरण की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।
गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव के दौरान 'मोदी की गारंटी' के तहत पंचायत सचिवों को आश्वासन मिला था कि उनकी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई होगी। सचिवों को इस घोषणा से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन सरकार गठन को लगभग एक साल पूरा हो चुका है और अब तक शासकीयकरण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है।

नाराज पंचायत सचिव 18 मार्च से पूरे प्रदेश के जनपद मुख्यालयों में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर
इससे नाराज पंचायत सचिव 18 मार्च से पूरे प्रदेश के जनपद मुख्यालयों में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। उनके हड़ताल पर जाने से न केवल पंचायत स्तर पर कामकाज ठप हुआ है, बल्कि इससे संबंधित अन्य विभागों के कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।
स्थिति को गंभीर होता देख, शासन ने सभी जिलों के जिला पंचायत सीईओ को आदेश जारी कर 24 घंटे के भीतर काम पर न लौटने वाले सचिवों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इस आदेश की प्रति को पंचायत सचिवों ने सार्वजनिक रूप से जलाकर अपना विरोध जताया।
अब सवाल क्या सरकार 'मोदी की गारंटी' को पूरा करेगी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच 26 मार्च को पंचायत मंत्री के साथ पंचायत सचिव संघ के प्रदेशाध्यक्ष उपेंद्र कुमार पैकरा व अन्य प्रांतीय पदाधिकारियों की बैठक भी आयोजित की गई, लेकिन यह वार्ता भी विफल रही। इसके बाद सचिव संघ ने आंदोलन को और अधिक तेज करने का ऐलान कर दिया है।
अब सवाल यह है कि जो पंचायत सचिव वर्षों से गांवों में सरकारी योजनाओं की रीढ़ रहे हैं, उनकी आवाज कब सुनी जाएगी? क्या सरकार 'मोदी की गारंटी' को पूरा करेगी या यह वादा भी चुनावी घोषणाओं की भीड़ में गुम हो जाएगा? सचिवों की नाराजगी अब आंदोलन की आग में बदलती जा रही है, जो आने वाले समय में और व्यापक अस
र डाल सकती है।
