नरेंद्र कश्यप ने तकनीकी और जीवनशैली में अद्भुत बदलाव देखने वाली पीढ़ी बताई है, उनका कहना है,की यह जानकारी उन वर्ग के लोगों के लिए खाश है जो अभी 50 साल से 80 साल पार कर रहे है।
50 साल से 80 साल पार कर रहे बुजुर्गों की एक भावनाएं को इसमें शामिल किया गया है। जिनके अनुसार
तकनीकी और जीवनशैली में अद्भुत बदलाव देखने वाली पीढ़ी
जो DC से AC बिजली आते देखा।
बैलगाड़ी से शुरू होकर सुपर सोनिक जेट तक का सफर देखा।
बैरंग चिट्ठियों से लेकर लाइव वीडियो कॉल तक पहुंच बनाई।
मिट्टी की खुशबू और परियों की कहानियों वाला बचपन
मिट्टी के घरों में बैठकर दादी-नानी से राजा-रानी की कहानियां सुनीं। ज़मीन पर बैठकर खाना खाया और चाय प्लेट में डालकर पी।
पारंपरिक खेलों से भरपूर बचपन
गिल्ली-डंडा, कंचे, खो-खो, कबड्डी, छुपन-छुपाई — ये थे हमारे वीडियो गेम। मोहल्ले के मैदान हमारी असली प्ले-स्टेशन थे।
लालटेन की रोशनी में पढ़ाई और नावेल चोरी से पढ़ना
चांदनी रातों में डीबरी, लालटेन और पीली बल्ब की रोशनी में पढ़ाई की। चादर के नीचे छिपकर नावेल पढ़ने का मज़ा ही अलग था।
खतों में जज़्बात और इंतज़ार का जमाना
अपने जज़्बात कागज़ में लिखते थे, खत महीनों बाद पहुंचते थे।
जवाब का इंतज़ार भी प्रेम का हिस्सा होता था।
बिना एसी, कूलर और हीटर के बचपन
बिना आधुनिक साधनों के सर्दी-गर्मी बरदाश्त की, पर शिकायत नहीं की।
बचपन की सादगी और पहचान
सरसों के तेल से बाल चमकाए। तख़्ती, सेठे की कलम और दवात से पढ़ाई की।
अनुशासन और सम्मान की शिक्षा
टीचरों से मार खाई और घर में बताने पर और मार पड़ी। मोहल्ले के बुजुर्गों को देखकर रास्ता बदल लेना आम था।
केनवास के जूतों को खड़िया से चमकाना
सफेद जूतों को खुद चमकाना एक गर्व की बात थी।
गुड़ की चाय और देसी मंजन
गुड़ की चाय, दंतमंजन, कभी नमक या कोयले से दांत साफ करना आम बात थी।
रेडियो का स्वर्णकाल
BBC की खबरें, बिनाका गीतमाला, विविध भारती और हवा महल जैसे कार्यक्रमों का अपना ही आनंद था।
छत पर चादर बिछाकर सोना
गर्मी की रातों में छत पर पानी का छिड़काव कर सफेद चादर बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला पंखा पूरे परिवार के लिए काफी होता था।
रिश्तों की मिठास और सामूहिकता
रिश्ते निभाने में दिल से जुड़े थे, कोई स्वार्थ नहीं होता था।
आज की तुलना में रिश्तों में अपनापन अधिक था।
कोरोना का काल और रिश्तों की दूरी
पहली बार देखा कि लोग अपनों को छूने से डर रहे थे।
अर्थियां बिना कंधों के उठीं, शव को दूर से अग्नि दी गई।
खुद अपने चेहरे को छूने से डरने लगे थे लोग।
एक अनोखी पीढ़ी जो दो दुनियाओं से जुड़ी है,
हमने अपने माता-पिता की बात भी मानी और अब बच्चों की भी मान रहे हैं। ये संतुलन अब दुर्लभ होता जा रहा है।
पंगत वाली शादी की थाली याद है
बुफे नहीं, पंगत में बैठने का अलग आनंद था:
पूड़ी चुन-चुनकर लेना।
उंगलियों से लड्डू का इशारा करना।
दूसरों की थाली में झांककर देखना कि क्या बाकी है।
रायते वाले को दूर से आते देख कटोरी खाली करना।
पानी वाले को ढूंढना एक जरूरी काम होता था।
हम वो खुशनसीब पीढ़ी हैं जिसने सादगी में सुख देखा, रिश्तों में मिठास पाई और आधुनिकता के अंधड़ में भी अपनी जड़ें नहीं छोड़ीं। यही यादें हैं जो हमें जोड़ती हैं — बीते कल से, अपने आप से।
