ख़ामोशी के बाद का तूफ़ान: जब धैर्य टूटता है

प्रलय का आगाज़

 

दलीलों की किताबें अब बंद कर दी हैं मैंने,

लिहाज़ की वो पुरानी चादर भी उतार फेंकी है।

तूने मेरे मौन को शायद मेरी कमज़ोरी समझा था,

पर क्या उस ख़ामोशी में पल रही तूफ़ानी आँधी देखी है?

 

बहुत हुआ मान-मनौव्वल, बहुत हुई झूठी आस,

अब न कोई तर्क बचा है, न ही कोई प्यास।

धैर्य का जो बांध था, वो अब टूट चुका है,

किस्मत का तीर कमान से अब छूट चुका है।

 

मेरे अंदर का वो शांत समंदर, अब उफान पर है,

हर एक ज़ख्म, हर एक धोखा, अब मेरी जुबान पर है।

चेतावनी का शोर थम गया, अब परिणाम की बारी है,

देख ज़रा गौर से, ये मेरी नहीं, काल की तैयारी है।

 

सुन ले, और अपने ज़हन में बिठा ले ये बात...

कि समझने और समझाने का वक्त खत्म हुआ लाला,

नियम, कायदे और डर का ताला, अब मैंने है तोड़ा।

बारूद के ढेर पर अब चिंगारी गिर चुकी है,

अब जो होगा उसे मैं स्वयं भी नहीं रोक सकता ।

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