राख होता हुआ अहसास
शुरुआत में जो आग थी, अब वो सिर्फ धुआं देती है,
मोहब्बत जब मरती है, तो बस खामो दुआ देती है।
न कोई चीख निकलती है, न कांच के टूटने की सदा,
एक सन्नाटा पसरता है, जैसे रूह हो रही हो जुदा।
वो पहली सी बात नहीं रही
कभी घंटो गुजरते थे, फिर भी बातें कम लगती थीं,
अब चंद मिनटों की गुफ्तगू भी, एक रस्म लगती है।
फोन की घंटी बजती है, तो धड़कन अब नहीं बढ़ती,
खत लिखे रखे हैं दराजों में, पर अब नज़र नहीं पड़ती।
फासलों का शोर
एक ही बिस्तर पर लेटे, कोसों दूर सोते हैं हम,
भीड़ में हाथ तो थामते हैं, पर तन्हाई में रोते हैं हम।
वो हंसी जो कभी खनकती थी, अब सिसकियों में ढल गई,
शायद वक्त की तपिश में, हमारी मासूमियत जल गई।
उम्मीद का बुझना
प्यार का मरना ऐसा है, जैसे दीये का तेल खत्म होना,
कोशिशें बहुत करना, पर फिर भी मेल खत्म होना।
अब न कोई शिकायत है, न कोई रूठना-मनाना है,
हमने मान लिया है कि, अब बस दूर चले जाना है।
अंतिम विदाई
धड़कनें गवाह हैं कि जिस्म तो अभी जिंदा है,
पर उस अहसास का परिंदा, अब पिंजरे में शर्मिंदा है।
प्यार मरता नहीं अक्सर, वो बस पत्थर हो जाता है,
इंसान भीड़ में रहकर भी, कहीं अंदर खो जाता है।
