राजनीतिक व्यंग्य समागम: हिंदुत्व, समरसता और ‘विश्व गुरु’ पर तीखे सवाल

समकालीन राजनीति और सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित दो चर्चित व्यंग्य लेखों ने वैचारिक बहस को नया आयाम दिया है। वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार विष्णु नागर तथा प्रख्यात व्यंग्यकार राजेंद्र शर्मा के लेखों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदुत्व की राजनीति, सामाजिक समरसता अभियानों और ‘विश्व गुरु’ की अवधारणा पर तीखी टिप्पणियां की गई हैं।

पहले लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित सामूहिक भोज की पृष्ठभूमि में जाति, समरसता और राजनीतिक प्रतीकवाद पर प्रश्न उठाए गए हैं। लेखक ने व्यंग्यात्मक शैली में सामाजिक समानता के दावों और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को रेखांकित किया है। लेख में दलित-आदिवासी समुदायों के साथ होने वाले भेदभाव, प्रतीकात्मक आयोजनों और राजनीतिक संदेशों के अंतर्विरोधों को उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

दूसरे व्यंग्य में केंद्र सरकार की ‘विश्व गुरु’ और तकनीकी महाशक्ति की छवि पर कटाक्ष किया गया है। इसमें एक अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी आयोजन के दौरान हुए विरोध-प्रदर्शन और उससे जुड़ी घटनाओं को आधार बनाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जनतांत्रिक अधिकारों और सत्ता की छवि-प्रबंधन रणनीतियों पर प्रश्न उठाए गए हैं। लेखक ने रोबोटिक प्रदर्शनों, विदेशी तकनीक और सोशल मीडिया विवादों के संदर्भ में व्यंग्य के जरिए राजनीतिक विमर्श को धार दी है।

दोनों लेखों की शैली तीखी, तंजपूर्ण और विचारोत्तेजक है। सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और राजनीतिक प्रतीकों के उपयोग पर केंद्रित यह व्यंग्य-समागम पाठकों को समकालीन राजनीति पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित करता है।

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