फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली आमलकी एकादशी इस वर्ष विशेष संयोग में पड़ रही है। इसे आंवला एकादशी, आमली ग्यारस तथा रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत-पूजन से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
तिथि और शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारंभ: 27 फरवरी 2026, रात्रि 12:33 (AM)
एकादशी तिथि समाप्त: 28 फरवरी 2026, रात्रि 10:32 (PM)
शास्त्र अनुसार द्वादशी युक्त एकादशी में व्रत का विधान है।
इस बार 28 फरवरी 2026, शनिवार को पुनर्वसु एवं पुष्य नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है, जिसे “जया द्वादशी” एवं “पापनाशिनी द्वादशी” कहा गया है।
अतः आमलकी एकादशी (महाद्वादशी) व्रत 28 फरवरी 2026, शनिवार को रखना श्रेष्ठ माना गया है।
पारण समय: 1 मार्च 2026, रविवार को प्रातः 6:28 से 8:45 बजे तक।
महत्व और पूजा विधान
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इस दिन व्रत रखकर विष्णु जी के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। श्रद्धा-भक्ति से किया गया व्रत समस्त कष्टों का नाश कर सुख-समृद्धि प्रदान करता है।
आमलकी एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में वैदिक नामक नगर में चैत्ररथ नाम के चंद्रवंशी राजा राज्य करते थे। नगरवासी विष्णु भक्त थे और एकादशी का व्रत करते थे। एक बार फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर रात्रि जागरण के दौरान एक शिकारी भी वहां ठहर गया और कथा सुनता रहा। अनजाने में व्रत-महात्म्य सुनने और जागरण का पुण्य उसे मिला।
मृत्यु के पश्चात वह राजा विदूरथ के घर वसुरथ नाम से जन्मा। एक दिन जंगल में डाकुओं ने उस पर हमला किया, किंतु उनके अस्त्र-शस्त्र निष्फल रहे। आकाशवाणी हुई कि यह पिछले जन्म में आमलकी एकादशी का पुण्यफल है।
मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक आमलकी एकादशी का व्रत-पूजन एवं कथा श्रवण करते हैं, उनके कष्ट स्वयं भगवान विष्णु दूर करते हैं।
