गौरेला–पेंड्रा–मरवाही से समाज परिवर्तन की कहानी
शिक्षा और स्वास्थ्य को समर्पित जनार्दन श्रीवास का सामाजिक सफर
गौरेला–पेंड्रा–मरवाही (छत्तीसगढ़):
छत्तीसगढ़ के जिला गौरेला–पेंड्रा–मरवाही से समाजसेवा को लेकर एक प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है। साधारण परिवार से आने वाले जनार्दन श्रीवास ने अपने जीवन का उद्देश्य समाज के लिए कार्य करना तय किया और समाजसेवा को केवल सेवा नहीं, बल्कि अपने कैरियर के रूप में अपनाया।
छोटे से गांव से निकलकर जनार्दन श्रीवास ने यह साबित किया है कि स्पष्ट सोच और मजबूत इरादों के साथ समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। सीमित संसाधनों और कई चुनौतियों के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा सहारा बनाया। उनका मानना है कि शिक्षा ही समाज में स्थायी और दूरगामी परिवर्तन की नींव रखती है।
समाजसेवा को भावनात्मक दायरे से आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इसे व्यवस्थित और दीर्घकालिक रूप देने का निर्णय लिया। इसी सोच के तहत वे वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े, जहाँ से उनके भीतर समाज, विशेषकर जनजातीय और वनांचल क्षेत्रों के लोगों के प्रति सेवा भावना और अधिक सशक्त हुई।
वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ने के बाद जनार्दन श्रीवास ने ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और जनकल्याण से जुड़े कार्यों में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। वे बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करने, लोगों को नशा मुक्ति, सामाजिक जिम्मेदारियों और सामाजिक मूल्यों के प्रति जागरूक करने जैसे कार्यों में लगातार सक्रिय हैं।
आज जनार्दन श्रीवास समाज के बीच एक सकारात्मक पहचान बना रहे हैं। उनका स्पष्ट लक्ष्य है कि वे स्वयं को एक जिम्मेदार, समर्पित और ईमानदार सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित करें। उनका जीवन शिक्षा और स्वास्थ्य—इन दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समर्पित है, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक भी विकास और आवश्यक सुविधाएँ पहुँच सकें।
निश्चित रूप से जनार्दन श्रीवास के प्रयास यह दर्शाते हैं कि समाजसेवा को अगर संकल्प, योजना और निरंतरता के साथ किया जाए, तो छोटे स्तर से भी बड़े बदलाव की नींव रखी जा सकती है। ऐसे प्रयास समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं और समाज को सकारात्म दिशा प्रदान करते हैं।
