63 की उम्र में सुनहरी उड़ान: फोर्स अकादमी मँझगवां की कोच सुनीता सिंह ने राष्ट्रीय मंच पर लहराया छत्तीसगढ़ का परचम

3000 मीटर वॉक में स्वर्ण, 100 मीटर रिले में कांस्य; उम्र को हराकर लिखी विश्वास और तपस्या की अमर कहानी

मरवाही/अवास कैवर्त 

कभी-कभी कुछ जीतें सिर्फ पदक नहीं होतीं… वे अधूरे सपनों की वापसी होती हैं। 63 साल की उम्र में जब जिंदगी अक्सर ठहराव मांगती है, तब मँझगवां की सुनीता सिंह ने अपने कदमों से ऐसी कहानी लिख दी, जिसे पढ़कर आंखें नम हो जाएं। यह केवल एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि एक कोच के उस आत्मविश्वास की जीत है, जिसे फिर से जीने का साहस मिला।

जबलपुर में आयोजित 45वीं राष्ट्रीय मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में उन्होंने 3000 मीटर वॉक रेस में स्वर्ण पदक और 100 मीटर रिले रेस में कांस्य पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती।

शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय अंडी से व्यायाम शिक्षक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उनके जीवन का एक अध्याय भले समाप्त हुआ, लेकिन भीतर का खिलाड़ी अब भी जीवित था। उन्होंने आराम नहीं चुना— उन्होंने फिर से शुरुआत चुनी। सुबह की ठंडी हवाओं में अभ्यास, थकान से लड़ते कदम, और हर दिन खुद को साबित करने का संकल्प… यही उनकी दिनचर्या बन गई।

कोच बनने के बाद उनके मन में एक सपना पलने लगा— राष्ट्रीय मंच पर पदक जीतने का। कई बार शरीर ने साथ नहीं दिया, कई बार उम्र ने सीमाएं खड़ी कीं, लेकिन उनके हौसले ने हर दीवार तोड़ दी।

जब स्वर्ण पदक उनके गले में डाला गया, उस क्षण उनकी आंखों से बहते आंसू सिर्फ खुशी के नहीं थे। वे उन तमाम सुबहों की गवाही थे, जब उन्होंने खुद को समझाया था— “अभी नहीं रुकना है।” वे उन रातों की कहानी थे, जब थकान के बावजूद मन ने हार नहीं मानी।

अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय सुनीता सिंह ने फोर्स अकादमी मँझगवां के संस्थापक डॉ. लाल उमेद सिंह, कोच वसीम सर, पूरे कोचिंग स्टाफ तथा अपने परिवार और शुभचिंतकों को दिया। उन्होंने भावुक होकर कहा कि यदि मार्गदर्शन, विश्वास और साथ न मिलता, तो यह सपना शायद अधूरा रह जाता।

उनका कहना है—

उम्र सिर्फ शरीर की होती है, सपनों की नहीं।”

उनकी यह उपलब्धि न केवल गौरेला–पेण्ड्रा–मरवाही (जीपीएम) जिले, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का क्षण है।

आज सुनीता सिंह केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक संदेश हैं—

कि अगर दिल में आग हो, तो 63 की उम्र में भी सुनहरी उड़ान भरी जा सकती है।

यह जीत एक पदक से कहीं ज्यादा है…

यह उन सभी लोगों के लिए उम्मीद है, जो कभी अपने सपनों को उम्र के हवाले कर देते हैं।

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