गुमिया में चारागाह भूमि पर संग्राम: कब्जे का आरोप या फर्जी शिकायत का खेल?

कोरबा। करतला जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत गुमिया में शासकीय चारागाह भूमि को लेकर विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। मामला इतना उलझ गया है कि जहां एक ओर अवैध कब्जे की शिकायत जनदर्शन तक पहुंच गई, वहीं दूसरी ओर सरपंच ने उसी शिकायत को फर्जी बताते हुए अपने सील और हस्ताक्षर के दुरुपयोग का आरोप लगा दिया है। इससे गांव की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में हलचल मच गई है।

 

दरअसल, ग्राम पंचायत गुमिया के नाम से सामुदायिक वन अधिकार पट्टा के तहत खसरा नंबर 1318/1, रकबा 2.832 हेक्टेयर भूमि चारागाह के लिए स्वीकृत बताई जाती है। यह भूमि गांव के मवेशियों की चराई और सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित है।

 

ग्रामीणों की ओर से की गई शिकायत में आरोप लगाया गया कि गांव के ही ओमप्रकाश उर्फ राजू साहू, जो स्वयं को भाजपा बरपाली मंडल अध्यक्ष बताते हैं, ने उक्त चारागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है। बताया गया कि शुरुआत में ग्रामीणों को यहां शासकीय औषधीय केंद्र बनने की बात कही गई, लेकिन धीरे-धीरे भूमि पर निजी कब्जा कर लिया गया। इससे गांव के मवेशियों को चराने में परेशानी होने की बात भी कही गई।

 

हालांकि, मामला तब और दिलचस्प हो गया जब ग्राम पंचायत गुमिया के सरपंच गौतम प्रसाद बियार ने कलेक्टर को पत्र लिखकर दावा किया कि इस शिकायत में उनके नाम से लगाए गए सील और हस्ताक्षर फर्जी हैं। सरपंच का कहना है कि उन्हें बदनाम करने और गांव की राजनीति में विवाद खड़ा करने की नीयत से यह शिकायत तैयार की गई है।

 

सरपंच ने अपने आवेदन में यह भी कहा कि वे और भाजपा मंडल अध्यक्ष ओमप्रकाश उर्फ राजू साहू मिलकर गांव में कई विकास कार्य कर रहे हैं, ऐसे में दोनों के बीच संबंध खराब करने के उद्देश्य से यह पूरा विवाद खड़ा किया गया है।

साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि जिस जमीन को लेकर अतिक्रमण का आरोप लगाया जा रहा है, वह जमीन राजू साहू को करीब 15 साल पहले उनके मामा द्वारा दी गई थी, जिस पर वे लंबे समय से खेती-किसानी करते आ रहे हैं। इसलिए अतिक्रमण की शिकायत को उन्होंने पूरी तरह निराधार और फर्जी बताया है।

 

इधर गांव में चर्चा यह भी है कि चारागाह भूमि का मामला अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। एक तरफ ग्रामीणों की शिकायत है, तो दूसरी तरफ सरपंच का फर्जी हस्ताक्षर और सील के दुरुपयोग का आरोप—जिससे पूरा मामला और उलझ गया है।

 

अब सबकी नजर जिला प्रशासन पर टिकी है। देखना होगा कि चारागाह भूमि पर कब्जे का आरोप सही निकलता है या फिर सच में फर्जी शिकायत का खेल रचा गया है। जांच के बाद ही इस पूरे विवाद की असल सच्चाई सामने आ पाएगी।

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