27 दिन की जंग के बाद नन्हीं जान को मिला नया जीवन एसएनसीयू जिला अस्पताल कोंडागांव में सफल इलाज, टीमवर्क बना मिसाल

कोंडागांव, 22 फरवरी 2026 | मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के दूरदर्शी विजन के अनुरूप प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार का सकारात्मक परिणाम अब जिला स्तर पर दिखने लगा है। इसी का सशक्त उदाहरण जिला अस्पताल कोंडागांव की नवजात गहन चिकित्सा इकाई (एसएनसीयू) में देखने को मिला, जहां एक गंभीर अवस्था में जन्मे नवजात शिशु को 27 दिनों के सतत उपचार के बाद नया जीवन मिला।

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कलेक्टर नूपुर राशि पन्ना के सतत निर्देशन, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. चतुर्वेदी के मार्गदर्शन तथा सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक डॉ. प्रेमलाल मंडावी के नेतृत्व में जिला अस्पताल की सेवाओं को लगातार सशक्त किया जा रहा है। संसाधनों, जीवनरक्षक उपकरणों और नियमित मॉनिटरिंग के चलते एसएनसीयू अब दूरस्थ अंचलों के लिए आशा की किरण बन चुकी है।

 

ग्राम राकसबेड़ा, विकासखंड माकड़ी निवासी सुखदई मरकाम एवं चैतराम मरकाम के नवजात शिशु का जन्म 18 दिसंबर 2025 को हुआ। जन्म के बाद ही शिशु की स्थिति गंभीर हो गई और 20 दिसंबर को उसे एसएनसीयू में भर्ती किया गया। शिशु बर्थ एस्फिक्सिया, लगातार दौरे, संक्रमण तथा सेप्सिस जैसी जटिल समस्याओं से जूझ रहा था, वहीं गर्भावस्था के दौरान माता में गंभीर ओलिगोहाइड्राम्नियोस की स्थिति भी पाई गई थी।

 

शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. रुद्र कश्यप, डॉ. राजेश बघेल एवं डॉ. परोमिता सूत्रधार सहित पूरी एसएनसीयू टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया। प्रारंभ में ऑक्सीजन सपोर्ट व एंटीबायोटिक दिए गए, बाद में शिशु को 12 दिनों तक मैकेनिकल वेंटिलेशन पर रखकर गहन निगरानी में उपचार किया गया। जटिलताओं के दौरान उच्च श्रेणी के एंटीबायोटिक, फ्लुकोनाजोल तथा दौरे नियंत्रित करने के लिए आवश्यक दवाएं दी गईं।

 

लगातार 18 दिनों के उपचार के बाद शिशु की स्थिति में सुधार आया और 19वें दिन से कंगारू मदर केयर (केएमसी) शुरू की गई। करीब 27 दिनों के अथक प्रयासों के बाद शिशु पूरी तरह स्थिर हुआ और उसे स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दी गई।

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यह प्रकरण न केवल जिला अस्पताल कोंडागांव की एसएनसीयू इकाई की उत्कृष्ट सेवाओं का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अब जिला स्तर पर ही उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होने से दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को महानगरों की ओर भटकने की आवश्यकता नहीं पड़ रही है। यह सफलता पूरी चिकित्सकीय टीम के समर्पण, संवेदनशीलता और समन्वय का जीवंत प्रमाण है।

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